उत्तराखंड के चमोली जिले स्थित विश्व प्राकृतिक धरोहर नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क (Nanda Devi National Park) में 21 दिनों तक चला दशकीय जैव विविधता अनुश्रवण अभियान-2026 सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। वैज्ञानिकों, वन अधिकारियों और सुरक्षा बलों की संयुक्त टीम कठिन और दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में शोध कार्य पूरा कर सुरक्षित वापस ज्योतिर्मठ पहुंची। टीम के लौटने पर पार्क के प्रवेश द्वार स्थित लाता गांव में ग्रामीणों ने फूल-मालाओं के साथ उनका भव्य स्वागत किया। इसके बाद शोध दल ने क्षेत्र की आराध्य देवी मां नंदा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया।
21 दिनों तक चला वैज्ञानिक अध्ययन
7 जून से 28 जून 2026 तक संचालित इस अभियान का उद्देश्य नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क की जैव विविधता, हिमालयी पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करना था।
नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के उप वन संरक्षक (DFO) अभिमन्यु ने बताया कि अभियान में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय, उत्तराखंड वन विभाग, आईटीबीपी और एसडीआरएफ के वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, अधिकारी एवं जवान शामिल रहे। प्रतिकूल मौसम और दुर्गम परिस्थितियों के बावजूद टीम ने सभी निर्धारित वैज्ञानिक अध्ययन सफलतापूर्वक पूरे किए।
वन मंत्री ने दिखाई थी हरी झंडी
इस अभियान को 7 जून 2026 को उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल और प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) रंजन कुमार मिश्र ने ज्योतिर्मठ स्थित डिवीजन कार्यालय से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।
शोध दल ने लाता गांव से यात्रा शुरू कर लाताखर्क, धरासी, डिब्रूगेटा, डियोड़ी, भिटारतोली, रामणी, भुजगढ़, पातालखान और नंदा देवी के बेस कैंप सरसों पाताल तक पहुंचकर विस्तृत अध्ययन किया।
आधुनिक तकनीक से हुआ शोध
अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने कैमरा ट्रैप, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तथा हिमनदों और मोरेन के अध्ययन के लिए ओएसएल (OSL) जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। इसके जरिए उच्च हिमालयी वनस्पतियों, हिमनदों, भू-आकृति, वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए गए।
दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज
अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने कई दुर्लभ हिमालयी वन्यजीवों की उपस्थिति दर्ज की। इनमें हिमालयी थार, भरल, कस्तूरी मृग, हिमालयी भालू, साइबेरियन वीजल और पाईका प्रमुख रहे।
इसके अलावा हिम तेंदुआ, हिमालयी रेड फॉक्स, सिरो और हिमालयी मार्टिन के अप्रत्यक्ष प्रमाण भी मिले। वन्यजीवों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए 50 से अधिक कैमरा ट्रैप विभिन्न स्थानों पर लगाए गए।
हिमालयी पक्षियों और कीटों का भी अध्ययन
अभियान के दौरान राज्य पक्षी हिमालयी मोनाल, स्नो कॉक, स्नो पार्ट्रिज, गोल्डन ईगल, लैमरगायर और एशी वुड पिजन सहित कई महत्वपूर्ण पक्षियों की गणना और पहचान की गई।
वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयी बुग्यालों में पाए जाने वाले परागण करने वाले कीटों पर भी विशेष अध्ययन किया। इनमें बंबल बी, ब्लू अपोलो बटरफ्लाई और येलो स्वॉलोटेल जैसी प्रजातियां शामिल रहीं।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का भी हुआ आकलन
शोध दल ने हिमनदों, हिमरेखा, मोरेन और पर्वतीय भू-आकृति में हो रहे बदलावों का भी विस्तृत अध्ययन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और संरक्षण रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
लाइकेन बने स्वच्छ पर्यावरण के संकेतक
वैज्ञानिकों ने पार्क में विभिन्न ऊंचाइयों पर लाइकेन (Lichen) की कई प्रजातियों का अध्ययन किया। चूंकि नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क पिछले चार दशकों से मानवीय हस्तक्षेप से लगभग मुक्त है, इसलिए यहां लाइकेन और मॉस की भरपूर उपस्थिति दर्ज की गई। लाइकेन को स्वच्छ पर्यावरण और प्रदूषण का महत्वपूर्ण जैव संकेतक माना जाता है।
स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर दिया गया जोर
अभियान की वापसी के दौरान वैज्ञानिकों ने लाता गांव के ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों से संवाद किया। इस दौरान पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय भागीदारी और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने पर विशेष चर्चा हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय समुदाय की सहभागिता से नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क जैसी विश्व धरोहर के संरक्षण और अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।
वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने किया नेतृत्व
इस वैज्ञानिक अभियान का नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के पूर्व संकायाध्यक्ष एवं निदेशक प्रो. जी. एस. रावत ने किया। वहीं उत्तराखंड वन विभाग की ओर से सहायक वन संरक्षक उपेन्द्र सिंह ने टीम का नेतृत्व किया। संपूर्ण अभियान का संचालन नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के उप वन संरक्षक अभिमन्यु के निर्देशन में संपन्न हुआ।
इस अभियान से प्राप्त आंकड़े भविष्य में हिमालयी जैव विविधता संरक्षण, वन्यजीव प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक शोध के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।
