भारत में एनीमिया (खून की कमी) एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। खासकर महिलाओं में यह समस्या तेजी से देखी जाती है। इसी बीच भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के एक संयुक्त अध्ययन ने इस दिशा में अहम जानकारी सामने रखी है।
क्या कहती है नई रिसर्च?
एक मल्टीसेंट्रिक फेज-3 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (RCT) में यह पाया गया कि आयुर्वेदिक दवाएं — पुनर्नवाड़ी मंडूर और द्राक्षावलेह — आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंट के बराबर प्रभावी हो सकती हैं।
यह अध्ययन लगभग 4,000 गैर-गर्भवती महिलाओं (उम्र 18–49 वर्ष) पर किया गया, जो मध्यम एनीमिया से पीड़ित थीं।
कैसे किया गया परीक्षण?
- परीक्षण अवधि: 90 दिन
- मुख्य पैरामीटर:
- हीमोग्लोबिन स्तर
- अन्य क्लिनिकल संकेतक
- तुलना:
- आयुर्वेदिक दवाएं
- पारंपरिक आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंट
अध्ययन के निष्कर्षों में सामने आया कि दोनों आयुर्वेदिक उपचार, अकेले या संयोजन में, पारंपरिक उपचार जितने ही प्रभावी रहे।
स्वास्थ्य मंत्रालय का क्या कहना है?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, यह अध्ययन भारत में एनीमिया के उपचार के लिए समग्र (इंटीग्रेटेड) चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
राष्ट्रीय स्तर पर पेश हुए नतीजे
इस ट्रायल के परिणाम 20 मई 2026 को आयोजित ICMR Annual Clinical Trial Meet 2026 में पेश किए गए।
इस कार्यक्रम में शामिल हुए:
- डॉ. राजीव बहल
- राजेश कोटेचा
- विभिन्न वैज्ञानिक, डॉक्टर, नीति-निर्माता और शोधकर्ता
क्यों है यह स्टडी महत्वपूर्ण?
- भारत में एनीमिया महिलाओं में एक बड़ी समस्या
- आयुर्वेदिक विकल्पों को वैज्ञानिक मान्यता
- साइड इफेक्ट कम होने की संभावना
- ग्रामीण और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में बेहतर विकल्प
आगे की दिशा
इस कार्यक्रम के दौरान एक और रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें भारत में फेज-1 क्लिनिकल ट्रायल्स को बढ़ावा देने के लिए सुझाव दिए गए।
मुख्य सिफारिशें:
- नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना
- एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय
- क्लिनिकल रिसर्च सिस्टम को मजबूत करना
निष्कर्ष
यह अध्ययन बताता है कि आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के बीच तालमेल बनाकर एनीमिया जैसी बड़ी समस्या से प्रभावी तरीके से निपटा जा सकता है। हालांकि, किसी भी उपचार को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
