मसूरी-देहरादून मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध ‘पानी वाला बैंड’ का ऐतिहासिक प्राकृतिक जलस्रोत इन दिनों गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। वर्षों से लगातार प्रवाहित होने वाला यह जलस्रोत अब धीरे-धीरे सूखने की कगार पर पहुंच चुका है, जिससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ यात्रियों और पर्यटकों में भी गहरी चिंता देखी जा रही है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह जलस्रोत ब्रिटिश काल से अस्तित्व में है और सालभर लगातार स्वच्छ एवं ठंडा पानी उपलब्ध कराता रहा है। चारधाम यात्रा मार्ग पर स्थित होने के कारण यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक रुककर पानी पीते थे और कुछ देर विश्राम भी करते थे। लेकिन अब पानी का प्रवाह बेहद कम हो गया है, जिससे यहां आने वाले लोगों की आवाजाही भी प्रभावित होने लगी है।
कभी ठंडे-गर्म पानी के लिए प्रसिद्ध था यह स्थान
स्थानीय लोगों का कहना है कि गर्मियों में यह स्रोत ठंडा और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म पानी के लिए जाना जाता था। ऐसे ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्वरूप जलस्रोत का इस तरह धीरे-धीरे खत्म होना पर्यावरणीय दृष्टि से भी एक गंभीर संकेत माना जा रहा है।
स्थानीय लोगों ने जताई चिंता, जांच की मांग
ग्रामीणों और स्थानीय नागरिकों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि इस जलस्रोत के सूखने के कारणों की वैज्ञानिक जांच कराई जाए और इसके संरक्षण व पुनर्जीवन के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राकृतिक धरोहर का लाभ उठा सकें।
स्थानीय निवासी दीपक रावत ने बताया कि यह जलस्रोत मसूरी के साथ-साथ जौनपुर, टिहरी और उत्तरकाशी की ओर जाने वाले यात्रियों के लिए भी जीवनदायिनी था, जहां लोग नियमित रूप से पानी पीने रुकते थे। लेकिन अब इसके सूखने से क्षेत्र में मायूसी का माहौल है।
एक अन्य स्थानीय निवासी ऋषभ ने बताया कि जब अंग्रेजों द्वारा मसूरी-देहरादून मार्ग का निर्माण किया गया था, तब से यह जलस्रोत अस्तित्व में है। धीरे-धीरे इसके कमजोर होने से न केवल स्थानीय लोग बल्कि पर्यटक भी प्रभावित हो रहे हैं। यह स्थान ‘पानी वाला बैंड’ के नाम से पूरे उत्तराखंड में प्रसिद्ध है, लेकिन अब इसके भविष्य पर संकट गहराता जा रहा है।
प्राकृतिक धरोहर के रूप में पहचान रखने वाला यह जलस्रोत आज संरक्षण की राह देख रहा है।
